Thursday, July 12, 2018

कुंडलिनी जागरण का अपरोक्ष अनुभव (Experience of Kundalini Awakening)


मैं माताजी के साथ जगन्नाथ मंदिर पूरी में कई बार आया । बिना प्रभु कृपा के यह संभव नहीं की कोई बार बार आये और वह भी 10 दिनों तक रुके । लोगों के पास धन है, समय भी है, फिर भी प्रभुजी के पास नहीं आते । हम दोनों के ऊपर जगन्नाथ जी का विशेष अनुकंपा रहा है । कई अलौकिक अनुभूतियाँ हुई है । इस बार पूरी में 8 दिन रुक के 20 जून को हम गुवाहाटी की तरफ गए अम्बूवाची मेला में शामिल होने के लिए । 21 जून को कामाख्या देवी जी का दर्शन हुआ 4 घंटे लंबे समय के बाद । खचाखच श्रद्धालुओं से भीड़ भरा हुआ था । 22 जून से मंदिर बंद हुआ और भक्तों का विशाल समूह हर समय मंदिर परिसर तथा आसपास के जगह पे आसानी से नज़र आता था । कई साधु, सन्यासी, तांत्रिक, मांत्रिक आदि अपना डेरा जमाए हुए बैठे थे । हमने एक चक्कर पूरा घूमकर सबको देखा । माताजी ने बोला कि इन सब में कोई एक भी निष्काम भक्त नहीं है, सब में इच्छा लालसा भरी हुई है और सब तामसिक भक्त हैं । कामाख्या पीठ तंत्र क्षेत्र का सर्वोच्च स्थान है । तांत्रिकों से भरा ये पीठ हमेशा साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ है । कामाख्या माता हर वर्ष ऋतुमती बनती हैं और मंदिर 4 दिन के लिये बंद होता है । इन दिनों में देवी जी की अद्भुत कृपा होती है, पूरा मंदिर परिसर एक विशेष ऊर्जा से भरा होता है और जो भी इस आध्यात्मिक वायुमंडल में आता है, उसका चमत्कार परिणाम अनुभव हुआ है । इसीलिए साधकमण्डली हमेशा इस सुनहरा अवसर का लाभ उठाने के लिए तत्पर रहते हैं । इन दिनों में किया हुआ एक जाप हज़ार गुना का फल देता है । विशाल जनसमूह को देखकर आसाम सरकार ने पूरा व्यवस्था अच्छी तरह किया था । कामाख्या मंदिर कामरूप पर्वत पे है और निचेे से पदयात्रा करनी पड़ती है मेले के दिनों में, क्योंकी गाड़ियों का ऊपर आना बर्जित होता है । 3 किलोमीटर पैदल चढ़के हम जब मंदिर में आये तो, भयंकर रूप से भीड़ था । मंदिर के चारों तरफ साधकों का जाप, ध्यान चल रहा था । हम को एक जगह मिल गया और हम आसान बिछा कर बैठ गए जाप करने । माताजी तो बैठते ही उनको देवीजी का अलौकिक दर्शन हुआ । मैं बैठते ही हिलने लगा जोर से आगे और पीछे, पेंडुलम धड़ी की तरह । कुछ देर बाद हम उठे और एक दूसरे जगह पे जाके विश्राम किए । पूरी रात मंदिर में ही रुके । लोगों का भक्ति अटूट था, जगह जगह पर ध्यान, माला जाप, भजन, कीर्तन आदि । अगले दिन सुबह होते ही हम निकल आये मंदिर से । शारीरिक थकान के कारण हमने दूसरे दिन मंदिर जाना ठीक नहीं समझा । माता को तो श्रद्धा और भक्ति से कहीं भी बुलाया जा सकता है । रातको हमने घर पे ही ध्यान किया और कुछ दैविक अनुभव हुआ ।


आनेवाले दिनों में हम कभी मंदिर जा न सके क्योंकि शरीर कमजोर पड़ गया था । 25 जुलाई दोपहर को दिव्यांशी माँ का अचानक सेहत बिगड़ गया । वो मुझे जोर से पुकारे और वो अत्यंत पीड़ा में थी । उनका शरीर काँप रहा था, शर दर्द से फटा जा रहा था । पूरे शरीर पे रोंगटे खड़े होगये और ठंडा पड़ गया । उनका मानसिक सन्तुलन तो सही था लेकिन उनको लगता था कि वो संतुलन खो रही हैं । एक दिव्य ज्योति हमेशा उनको दिखाई दिया, आँख बंद या खुला हुआ हो । उनके पूरे शरीर पे एक सुगंध भर गया था । उनको देवी देवताओं का दर्शन हुआ और लगा कि वो सब उनके पास ही खड़े हैं और मुस्कुराट से देख रहे हैं । अपने गुरु कृपालु महाराज और श्रीकृष्ण उनके पास बैठे हैं । विभिन्न प्रकार के किरणों और तरंगों से उनका शरीर ढाका हुआ लगता था । आंखों से अनवरत आंसू बहती भक्ति भाव से । कई दिव्य अनुभूतियाँ का वर्णन यहाँ पे नहीं कर सकता । अगले कुछ दिनों तक उनका शरीर बिगड़ने लगा, उनको बुखार, सर्दी, शरदर्द हमेशा लगा रहता था । उनको और भूख नहीं लगती थी , जबरदस्ती से ही खाना खाती थी, उनको खाना रुचिकर नहीं लगता । नींद गायब हो चुका था, फिर भी वो कभी कमजोर अनुभव नहीं किये । उनका शरीर उनको अत्यंत सुंदर, हलका लगा और उनके मन में किसी भी प्रकार से आसक्ति नहीं रहा । हमेशा एक अलग दुनियां में डूबी रहती थीं । मुझे बार बार पूछती की कहीं वो पागल तो नहीं हो गयी । कुंडलिनी सर्प उनके अंदर से ऊपर उठ कर आज्ञाचक्र और सहस्रार को भेद कर ऊपर आता और कभी अंदर चला जाता । उनके सर पे हमेशा पीड़ा रहती थी, आज्ञा चक्र के सामने और पीछे भाग में, फिर सहस्रार में  और ललाट के दो को कोनों में । सभी चक्र को वो खुद देख सकी और उनका रंग तथा चक्र से जुड़ी हुई दिव्य भाव का बयान करती । वो बोलती वो अपने शरीर के अंदर सब कुछ देख पा रही, जैसे रक्त का प्रभाव, सब ग्रंथि, स्नायुतन्तु, सब कुछ । और उन्होंने मेरेे अंदर भी सब कुछ देख पा रही थी । दूरश्रवण, दूरदर्शन, सूक्ष्मदर्शन, मन को पढ़ना, आदि अस्ट सिद्धि का अनुभव करने लगी । 26 जुलाई को हम गुवाहाटी छोड़कर बैंगलोर आगये । उन्होंने कई सारे दवाइयां ली , लेकिन किसीका कुछ असर नहीं हुआ । सरदर्द, सर्दी कम होता ही नही था ।

Wednesday, May 9, 2018

मैं, माला और वो - भाग 2

आध्यात्मिक मार्ग बहुत ही कठिन होता है । ऊपर से जितना सीधा और सरल लगता है, अंदर से पाना उतना ही जटिल होता है । क्योंकि हम सब संसार में डूबे हुए हैं, मन माया से उभरकर प्रभु में लीन होने के लिए अथक प्रयास करता है, जो बहुत ही दुर्गम है । अगर इतना ही सरल होता तो सब लोग भगवान को पा ही लेते । बिना समर्पण और भक्ति के प्रभु का सान्निध्य नहीं मिल सकता । मुझे इतना समझने के लिए बहुत कुछ गँवाना पड़ा । क्यों की इस राह पे चलते मुझे कुछ गलत लोग मिल गए, जो मुझे गुमराह किये ।


इस मार्ग पे चलना सरल है, लेकिन उतना ही विश्वास होना चाहिए और सही मार्गदर्शक मिलना चाहिए । आज के जमाने में बहुत ढोंगी और झूठे लोग हैं, जो की लालच और स्वार्थ के कारण कुछ भी गलत रास्ता दिखा देते हैं ।  मन, ह्रदय साफ हो तो ईश्वर की अनुकंपा होगी । कुटिल मन और ह्रदय के प्राणी को जितना भी ज्ञान दो, वो सुधर नहीं सकता । और ये सब पूर्व जन्म के कर्म पर भी निर्भर है । अगर किसीने पूर्व जन्म में उतना ही जप, तप, ध्यान और भक्ति किया होगा तो इसी जनम में उसको आध्यात्मिक मार्ग अवश्य मिलेगा । नहीं तो सब लोग आध्यात्मिक नहीं बन जाते । और कर्म के अनुरूप भाग्य  मिलता है सही समय आने पर । काल से पहले कुछ भी प्राप्त करना उचित नहीं है, और बहुत बार प्राप्ति का प्रयास भी विफ़ल जाता है ।

मेरी चेतना शक्ति पूर्ण रूपसे जाग्रत नहीं हुई है, इसीलिये मुझे बहुत लोगों के ठगा, गलत रास्ता दिखाया । सभी का जन्म एक उद्देश्य पूर्ति के लिए होता है । विरले ही उस उद्देश्य को समझते हैं और उसके पीछे चलते हैं । मैंने करोडो रूपए गवाये, मेरे से धोखे से लूटा गया, विश्वाश मेरा टूट गया इन सब लोगों से । फिर भी मेरी अंतरात्मा ढूंढ रही है ब्रह्म से मिलने के लिए । और अंत में मुझे सही साथी, मार्गदर्शक मिल गया । माँ दिव्यांशी ने मेरे जीवन में कदम रखा । माताजी से मिलने से पहले ही वो मेरे बारे में सब कुछ जान गयी थी । वो साक्षात देवी हैं, मैंने खुद भी उनका असली रूप देखा है । कहते हैं कि ईश्वर बहुत परीक्षा लेता है उस तक पहुँचने के लिए । सारे रास्ते बंद कर देता है, देखता है कि क्या ये भक्त फिर भी मुझे मिलने के लिए तरसता है कि नहीं । और अंत में विजय भक्त की ही होता है जो अटल विश्वास के साथ भक्ति में डूबा हुआ हो । ऐसे ही मेरा साथ हुआ, जब मेरे से सब कुछ छीन गया गलत लोगों के गलत रास्ता दिखाके, फिर भी मैं हारा नहीं था, एक दिन सही रास्ता मिल गया और माता जी का आगमन हुआ जीवन में ।

माताजी के आते ही मेरे धीरे धीरे काम सुधारने लगे । पहले जो में गलत लोगों के चक्रब्युह में फँस गया था, जब मैंने इसमें निकलने का प्रयास किया, तो फिर कई बार तांत्रिक हमले भी हुए मेरे और माताजी के ऊपर । जब स्वयं माँ योगमाया दुर्गा अपने साथ है, तो भला कोई दुष्ट शक्ति कैसे काम करेगी । एक एक करके सब दुष्ट लोगों से मेरी मुक्ति करवा दी । फिर भी मेरेे परिवार वालों को यह पसंद नहीं था कि मैं आध्यात्मिक मार्ग पे पूरी तरह डूब जाऊं । मैंने नौकरी भी छोड़ दिया था और आर्थिक संकट में पड़ा था । माता जी के मदद से दोनों ही सरल होगये । 

चमत्कार ही मनुष्य को सही मार्ग दिखाता है जब कोई भटका हुआ हो । माताजी ने बहुत सारे अद्भुत चमत्कार दिखाएं हैं । वैसे तो उनके जीवन में बचपन से ही ऐश्वरिक चमत्कार कई सारे हुए हैं । जब वो अपनी माँ के गर्भ में थी, उनके पिता को दैवी संदेश मिला था कि एक देवीकन्या जन्म लेने वाली है । अष्टम गर्भ में कृष्ण जन्माष्टमी के दिन उनका जन्म हुआ । जन्म के वाद उनके घरमें धन का आगमन होता रहता था। वो ब्राह्मण कुल से हैं । पिता एक देवता स्वरूप आध्यात्मिक पुरुष थे । उनके मार्ग दर्शन के कारण वो इतने ऊंचे स्तर तक गयी । बचपन में ही कृष्ण के प्रति अपार स्नेह, भक्ति देख वो समझगयीं थी के वो ही बास्तव में कृष्ण के राधा हैं । युवा अवस्था (18साल) मे उन्होंने गृह त्याग दिया परिवार के विरोध में और आध्यात्मिक प्रगति उनकी बढ़ने लगी । वो अकेले ही चल पड़ी थी केवल ईश्वर के सहारे । एक अत्यंत सुंदर रूपवती कन्या को देखकर बहुत लोगों ने उनके पीछे भी पड़े, लेकिन चमत्कार के प्रभास से सब उनको अपनी माता देवी समझ पाये । उन्होंने कई रातें कई दिन ऐसे ही बिना कुछ खाये उनको गुज़ारा करना पड़ा । धीरे धीरे दैवी चमत्कारों के प्रभाव से सब लोगों ने उनको माता कह कर उनकी पूजा करने लगे । जहाँ भी वो जाती, भजन कीर्तन करते हुए पुष्प बारिश करते हुए उनके भक्त मंडली उनके साथ पहुंच जाती । कई घरों में निःसंतान को संतान की प्राप्ति दिलाई, कईयोंका शादी कराके घर बसाया । उनकी लंबी गाथा का यहां वर्णन करना उचित नहीं है । मैंने उनके साथ कई बार ध्यान किया । और हर बार मुझे अद्भुत अनुभूति हुई । कभी आकाश से फूलों का गिरना, उनके पैरों से दूध निकलना, दैवी शक्तियोंका आगमन होना आदि । प्रभु के आश्रय में जो आजाते हैं, उन में आनंद ही आनंद रमता है ।



Tuesday, April 24, 2018

The Veil

Hovering across the world, the sweetness and the cacophony
elucidating the hidden presence, in symphony
Veil, the beauty, from atom to cosmos
spread over eternity, in synchronous
The never-ending playful theatre
have I lost myself completely here?
Now is time to break the wall to find reality
who has been waiting since ages for its identity
Lets churn the wheels to awaken the serpentine
And open the real eye and lotus petals of mine
Loving the flesh which was relished for countless days
the so called 'I' has  gone in some seconds
The relations, charisma here are just in a dream
Wow! suddenly I meet my home in stream
Which have been used, loved and kept to heart
That notorious pious pyre will make them apart
Cried I and smiled they, when I entered in a cage
Uncovering the veil, it's so amusing to gaze!
So peaceful and grandiose is my universe
Felt as if I'm in the womb of cosmos.

Tuesday, February 14, 2017

साधना - दो धारी तलवार

हे शक्तियां, मुझे ऐसे लुक्काछुप्पी खेल खेलने में आनंद नहीं आता । क्या भक्त और आराध्य के बीच में इतनी परीक्षा , छल शोभा देता है कि भक्त या साधक थका हारा मर जाये । यदि मिलना ही है तो प्रत्यक्ष आके मिलो । यूँ वेश बदलके आना और उलटे सीधे तरीके के मिलना, इन सब से मैं थक चुका हूँ । मिलना है तो सीधे मिलो, नहीं तो नहीं ।

ये सुक्ष्म और स्थूल में आपको इतनी तकलीफ क्यों है ? हालांकि आपके लिए तो सब एक खेल ही है । या तो मुझे सूक्ष्म में जाने का मार्ग दिखाओ, नहीं तो खुद स्थूल में आजाओ प्रत्यक्ष । पूजा, जप, तप, ध्यान सब कुछ तो किया, और बाकी क्या रहा ? ईश्वर की उपलब्धि क्या इतनी जटिल, कठिन है?

संसार की इतनी जटिलता ने मुझे यूँ पकड़ के रखा है कि मैं चाहूँ तो भी माया से परे नहीं हो सकता । और जब मैं माया में घुसने की प्रयास करूँ तो आप कठिन मार्ग चुनने में विवश करते हो । क्या करूँ कुछ समझ नहीं आता । ये दो धारी तलवार में चलना बहुत ही कठिन है । सब कुछ गँवाना पड़ता है । और फिर भी कुछ हासिल नहीं होता । ये दशम द्वार का उन्मोचन ही ब्रह्माण्ड के रहस्य का खुलासा होगा ।

Saturday, December 10, 2016

वैदेही

तुम इतना दर्द छुपाके बैठी हो
ज़मानों से किसी कोने में
सब को चाहिए बस तुम
और तुमने कभी ज़िक्र भी नहीं किया
तुम्हारी इच्छा अभिलाषा ।

कैसी है ये पहेली
जब तुम गिलास भर पानी लाती हो
ये आँखें गिलास से भी ज्यादा भरी थी ।
खुले आसमान में उड़ने को डरती हो
शायद फिरसे कोई पंख न काट दे ।

ये लोगों की बंधनों से छूटो
ये गालों पर, चेहरे पर सजना
आँखों में काजल से आँसूँ छिपाना
लबों को लालिमा की कसक में ओढ़ना
शरीर को सँवारना
किसी और के लिये
कभी तो खुद के लिये सँवारो ।

बचपन से खेलना, चाहना
आकांक्षाओं का हनन जब हुआ
तुमने भी अपना लिया झूठे मुस्कान
और बाँटने लगी दिलों में मुस्कराहट की पुड़िया
दिल को सुकून के लिए ढूंढ़ी हो
कितने चेहरे, कितने माहौल
लेकिन एकांत शांति ही मिला नहीं ।

मैं कोई पंख दे सकूँ या नहीं
लेकिन उड़ना तुमको ही है
कैद की ज़िन्दगी कभी ईश्वर ने दी नहीं
ये तो हौंसलों की उड़ान है
आगे की रास्ते सब पड़े हैं
तुम्हें बस एक कदम फिर से शुरू करना होगा ।


Friday, November 25, 2016

ମିଛ ମାୟାର ଏ ଜୀବନ



ମିଛ ମାୟାର ଏ ଜୀବନ
କେତେ ଦିନର
ଯୋଉଥି ପାଇଁ ମଣିଷ କେତେ କଣ ଗଢ଼େ
ସବୁ କିଛି ଏହାକୁ ହିଁ ନିଜର ଭାବେ
କେତେ ସମ୍ପର୍କ ଗଢ଼ି ତୋଳେ
କେତେ ସୁଖ ସୁବିଧାର ରାସ୍ତା ଖୋଜେ
ହେଲେ ଦିନେ ସବୁ ଛାଡ଼ିବାକୁ ପଡ଼େ
ସବୁ ଚିତାରେ ସ୍ୱାହା ହୁଏ
ଲୋକଙ୍କ ପାଖେ ରୁହେ ଲୁହ ଆଉ ରାମ ନାମର ଧ୍ୱନି
କଣ ଏଇ ସଂସାରରେ ଆଣିଥିଲା ଯେ
ଛାଡ଼ିକି ଯିବାରେ ଏତେ କଷ୍ଟ
ଯେଉଁମାନେ ନିଜର କେବେ ନଥିଲେ ।
ଆଜି ଏଇ ହରିଶ୍ଚନ୍ଦ୍ର ଘାଟରେ
କେତେ ଯେ ଚିତା ଜଳିବାର ଦେଖିଲି
ବାସ୍ ମୁକ ହୋଇ ଦେଖୁଥାଏଁ, ଭାବୁଥାଏଁ
ସେଇ ମାଂସ ପୋଡ଼ାର ଗନ୍ଧ
ମୋତେ ଆହୁରି ଟାଣୁଥାଏ ବିରାଗକୁ ।
ମୋର ଆଉ କିଛି ବୋଲି ନାହିଁ
ମୁଁ ଏବେ ଜାଣିଗଲି
ଯେତିକି ଟିକେ ସବୁ ସମ୍ପର୍କ ଅଛି
କିଛି ନା କିଛି କର୍ମ ବନ୍ଧନରୁ
ବାସ୍ ପୁରା କରି
ମୁଁ ବି ଜଳିବାକୁ ଚିତାରେ ଏବେଠୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ ।

Written on 25-04-2016 in Harishchandra Ghat, Varanasi.

Sunday, April 10, 2016

मैं, माला और वो

जीवन के न जाने कितने साल ऐसे ही बीत गये, बिना कुछ किये, बिना कुछ हासिल किये । यद्यपि सान्सारिक क्षेत्र में इन सबका महत्व है, लेकिन मेरे दृष्टि में गौण हैं । मैं अन्दर ही हमेशा ढुन्ढ रहा था, उसको किसी भी तरह जानने के लिये, उसकी झलक पाने के लिये । शायद इसकी नीव मेरे दादाजी ने रखी थी मेरे बचपन में । उनकी सतत चेस्टा हम लोगोंको सही रास्ते पे लाने के लिए बनी रही । मेरे दादाजी श्री नारायाण भरोसा मेहेर – एक महान व्यक्तित्व थे । मुझे लगता है उनके पास कुछ दैवी शक्तियां थीं । वे कवि, लेखक, ज्योतिषी, वैद्य और शिक्षक थे – सभी क्षेत्रमें वे सिद्धहस्त थे । उनके पिताजी श्री मनोहर मेहेर प्रसिद्ध कवि, ज्योतिषी थे । बचपन में मेरे दादाजी से उनके बारे में बहुत कुछ जाना, वे असामान्य प्रतिभा के योग्य अधिकरी थे । उनके लिखित पुस्तकें आज भी जनमानस में प्रचलित हैं ।

बचपन में हम सिनापालि में रहते थे, जो कि हमारा गांव है । गांव की वो मधुर चित्र आज भी मेरे मन में दिखाई देती है । १९८७ की बात है, मेरी आयु ५ साल थी । हमारे घर में एक ब्लाकबोर्ड था, जहाँ दादाजी ने बहुत कुछ सिखाया था । अमरकोष भी पढ़ते थे । ज्योतिष का ज्ञान भी मिला, हालाकि अभी सब भुल चुका हुँ । उनकी कविताओं को लिखना, उनके साथ पुजा करना, और न जाने अनगिनत पौराणिक कथाएँ सुनना – ऐसी अनेक अभुले स्मृती हैं जो हमेशा मनके किसी कोने से मुझे अध्यात्म में जाने के लिये प्रेरित करते हैं । मुझे आभास है, दादाजी और परदादाजी सुक्ष्म रूप से मुझे मार्गदर्शन दे रहे हैं ।

जीवन के ९-१० साल के अनमोल समय जो दादाजी के साथ रहा, वो सबसे बड़ी उपलब्धी है । मेरे जैसे अन्य बच्चे खेलते, कुदते, शैतानी करते, पढ़ते, लेकिन हमारे परिवार में इसके साथ सात्विक वाताबरण का प्रभाव बड़ा गहरा असर किया है, जो उनके कारण था । जीवन के रस्ते पर संयोग से मुझे बहुत तीर्थों, महात्माओं का दर्शना हुआ है । पूज्य गुरुजी निखिलेश्वरानन्द जी से दीक्षा लेने के बाद जीवन ने नया मोड़ लिया । उनके प्रेरणा से मुझे अध्यात्म और ज्ञान से विज्ञान के क्षेत्र में जाने का पथ खुलगया, जो अभी मैं चलरहा हुँ ।

बोलतें हैं ना – भगवान के घर में देर है, अन्धेर नहीं । अगर कोई सच्चे दिल से कुछ भी करने का अथक, निरन्तर प्रयास करे तो अवश्य उसे प्राप्त होगा । दुनिया में बहुत सारे रहस्य हैं, जो की अच्छे जिज्ञासु को जानना चाहिये । सबसे बड़ा है आत्मज्ञान । इसे प्राप्त करने के लिये नचिकेता का उदाहरण सबसे श्रेष्ठ है । हमारे सनातन वैदिक धर्म, शास्त्र में इसे इतनी गुढ़ता से बताया गया है की इसको सही में जानने के लिये कठिन से कठिन प्रयास करनी पड़ेगी । सभी ने गुप्त जरीये से प्रकट किया है । जैसे -

कवीर की वाणी में –
समुद्र में बुन्द समाहि, यह जानत सब कोय ।
बुन्द में समुद्र समाहि, विरला जाने कोय ॥

गोस्वामी तुलसी दास लिखते हैं –
सीयाराम मय सब जग जानि
करऊं प्रणाम जोड़ी युग पाणी ।


अब इस अनुभूती को प्राप्त करने की प्रयास चालु है मुझ में । सन्सार रहस्यमय और विज्ञानमय है । इस विज्ञान को समझ ने के लिये अन्दर की वैज्ञानिक शक्ति को जगानी है । 

                                         क्रमशः

Sunday, September 13, 2015

ये मोतिआँ और न गिरने दो

न कुछ चाहा, न कुछ सोचा
बस उसके लिये खुदको सौँप दी !
ये प्रेम, कोमलता ही सदियों से
आपको लूटती, तड़पाती आ रही है ।

हे नारी !
और कितना साहस है दिलमें
पता है,
ये भन्डारा कभी खाली न होगा ।
ममता, प्रेम के सुमन कभी मुर्झाते नहीं
फिर ये अनमोल मोतिआँ क्युँ गिरजाते
इनको समेटे रखो, खुदके लिये ।

फरेब की ज़िन्दगी, निष्ठुर समाज में
क्या मिला, कुछ हासिल हुआ ?
सब तो खोया है, लुटाया है ।
ये सन्सार कभी सुधरेगा नहीं
सदियों से उसकी अहं के लिये
आपको बलि चढ़ाता आया है

खुदके लिये कभी समझो
ये ईश्वर कोई और है
अब अमृत की धारा को रोको
ये मोतिआँ और न गिरने दो ।

(सभी नारिओँ को समर्पित) 
             सर्वेश्वर मेहेर - १३-०९-२०१५

Sunday, January 25, 2015

Love

Confidence debile; Unstable I, recurrent
For love, I merely repent.
Rather than love, it is business
Flashed in mind many a times, I guess.
Didn't have the passion to go through
When failed to veil pain, showed it though.
Of separation, the pain
After arrival of the bygone, still remain.
How the person has deserted so!
Its presence leaves and stays though.
Of union and separation, the strange game,
Love is; Makes me happy and cry, as a name.
Let be a fence, between us, there
Even though, I crossed it mere.
The dejected, I, cries on its future fatal
And nurtures your fortune vital
In the mention of lover, co-incidence
I still succumb and smile in sense.


[Original : Urdu Shayari by Gaurav Sood
English Transation : Sarbeswar Meher\

Monday, January 12, 2015

श्मशान

श्मशान से पबित्र
हो नहीं सकता
ना कोई स्थल
ना कोई स्थान ।
न मालुम इस भूमि में
प्रज्वलित अग्नि
सदियों से
कितने जीवों के
प्राणरहित देहों की
आहुति लेती आ रही है
और लेती रहेगी ।

कितने योद्धा, राजा, साधु, नेता
भस्म हुए,
प्रज्वलित अग्नि के रुप में
महाकाल की जिव्हा में ।
घमण्ड, प्रेम, द्वेश, लाज भी
बलि चढ़े यहाँ ।
सभी को राख में ही मिलना है
सिखाती यह ज्ञा
शुन्यता की
शरीर से मुक्ति की, चेतना की ।

पुण्याश्रय है श्मशान
है स्वच्छ, निर्मल
न कोई भेदभाव है उसमें
उससे डरकर भाग नहीं सकते ।
ना पृथ्वी, आकाश, पाताल में,
कहीं भी कोई स्थान नहीं
जहाँ छिपकर तुम बच सकते ।