Tuesday, February 14, 2017

साधना - दो धारी तलवार

हे शक्तियां, मुझे ऐसे लुक्काछुप्पी खेल खेलने में आनंद नहीं आता । क्या भक्त और आराध्य के बीच में इतनी परीक्षा , छल शोभा देता है कि भक्त या साधक थका हारा मर जाये । यदि मिलना ही है तो प्रत्यक्ष आके मिलो । यूँ वेश बदलके आना और उलटे सीधे तरीके के मिलना, इन सब से मैं थक चुका हूँ । मिलना है तो सीधे मिलो, नहीं तो नहीं ।

ये सुक्ष्म और स्थूल में आपको इतनी तकलीफ क्यों है ? हालांकि आपके लिए तो सब एक खेल ही है । या तो मुझे सूक्ष्म में जाने का मार्ग दिखाओ, नहीं तो खुद स्थूल में आजाओ प्रत्यक्ष । पूजा, जप, तप, ध्यान सब कुछ तो किया, और बाकी क्या रहा ? ईश्वर की उपलब्धि क्या इतनी जटिल, कठिन है?

संसार की इतनी जटिलता ने मुझे यूँ पकड़ के रखा है कि मैं चाहूँ तो भी माया से परे नहीं हो सकता । और जब मैं माया में घुसने की प्रयास करूँ तो आप कठिन मार्ग चुनने में विवश करते हो । क्या करूँ कुछ समझ नहीं आता । ये दो धारी तलवार में चलना बहुत ही कठिन है । सब कुछ गँवाना पड़ता है । और फिर भी कुछ हासिल नहीं होता । ये दशम द्वार का उन्मोचन ही ब्रह्माण्ड के रहस्य का खुलासा होगा ।

Saturday, December 10, 2016

वैदेही

तुम इतना दर्द छुपाके बैठी हो
ज़मानों से किसी कोने में
सब को चाहिए बस तुम
और तुमने कभी ज़िक्र भी नहीं किया
तुम्हारी इच्छा अभिलाषा ।

कैसी है ये पहेली
जब तुम गिलास भर पानी लाती हो
ये आँखें गिलास से भी ज्यादा भरी थी ।
खुले आसमान में उड़ने को डरती हो
शायद फिरसे कोई पंख न काट दे ।

ये लोगों की बंधनों से छूटो
ये गालों पर, चेहरे पर सजना
आँखों में काजल से आँसूँ छिपाना
लबों को लालिमा की कसक में ओढ़ना
शरीर को सँवारना
किसी और के लिये
कभी तो खुद के लिये सँवारो ।

बचपन से खेलना, चाहना
आकांक्षाओं का हनन जब हुआ
तुमने भी अपना लिया झूठे मुस्कान
और बाँटने लगी दिलों में मुस्कराहट की पुड़िया
दिल को सुकून के लिए ढूंढ़ी हो
कितने चेहरे, कितने माहौल
लेकिन एकांत शांति ही मिला नहीं ।

मैं कोई पंख दे सकूँ या नहीं
लेकिन उड़ना तुमको ही है
कैद की ज़िन्दगी कभी ईश्वर ने दी नहीं
ये तो हौंसलों की उड़ान है
आगे की रास्ते सब पड़े हैं
तुम्हें बस एक कदम फिर से शुरू करना होगा ।


Friday, November 25, 2016

ମିଛ ମାୟାର ଏ ଜୀବନ



ମିଛ ମାୟାର ଏ ଜୀବନ
କେତେ ଦିନର
ଯୋଉଥି ପାଇଁ ମଣିଷ କେତେ କଣ ଗଢ଼େ
ସବୁ କିଛି ଏହାକୁ ହିଁ ନିଜର ଭାବେ
କେତେ ସମ୍ପର୍କ ଗଢ଼ି ତୋଳେ
କେତେ ସୁଖ ସୁବିଧାର ରାସ୍ତା ଖୋଜେ
ହେଲେ ଦିନେ ସବୁ ଛାଡ଼ିବାକୁ ପଡ଼େ
ସବୁ ଚିତାରେ ସ୍ୱାହା ହୁଏ
ଲୋକଙ୍କ ପାଖେ ରୁହେ ଲୁହ ଆଉ ରାମ ନାମର ଧ୍ୱନି
କଣ ଏଇ ସଂସାରରେ ଆଣିଥିଲା ଯେ
ଛାଡ଼ିକି ଯିବାରେ ଏତେ କଷ୍ଟ
ଯେଉଁମାନେ ନିଜର କେବେ ନଥିଲେ ।
ଆଜି ଏଇ ହରିଶ୍ଚନ୍ଦ୍ର ଘାଟରେ
କେତେ ଯେ ଚିତା ଜଳିବାର ଦେଖିଲି
ବାସ୍ ମୁକ ହୋଇ ଦେଖୁଥାଏଁ, ଭାବୁଥାଏଁ
ସେଇ ମାଂସ ପୋଡ଼ାର ଗନ୍ଧ
ମୋତେ ଆହୁରି ଟାଣୁଥାଏ ବିରାଗକୁ ।
ମୋର ଆଉ କିଛି ବୋଲି ନାହିଁ
ମୁଁ ଏବେ ଜାଣିଗଲି
ଯେତିକି ଟିକେ ସବୁ ସମ୍ପର୍କ ଅଛି
କିଛି ନା କିଛି କର୍ମ ବନ୍ଧନରୁ
ବାସ୍ ପୁରା କରି
ମୁଁ ବି ଜଳିବାକୁ ଚିତାରେ ଏବେଠୁ ପ୍ରସ୍ତୁତ ।

Written on 25-04-2016 in Harishchandra Ghat, Varanasi.

Sunday, April 10, 2016

मैं, माला और वो

जीवन के न जाने कितने साल ऐसे ही बीत गये, बिना कुछ किये, बिना कुछ हासिल किये । यद्यपि सान्सारिक क्षेत्र में इन सबका महत्व है, लेकिन मेरे दृष्टि में गौण हैं । मैं अन्दर ही हमेशा ढुन्ढ रहा था, उसको किसी भी तरह जानने के लिये, उसकी झलक पाने के लिये । शायद इसकी नीव मेरे दादाजी ने रखी थी मेरे बचपन में । उनकी सतत चेस्टा हम लोगोंको सही रास्ते पे लाने के लिए बनी रही । मेरे दादाजी श्री नारायाण भरोसा मेहेर – एक महान व्यक्तित्व थे । मुझे लगता है उनके पास कुछ दैवी शक्तियां थीं । वे कवि, लेखक, ज्योतिषी, वैद्य और शिक्षक थे – सभी क्षेत्रमें वे सिद्धहस्त थे । उनके पिताजी श्री मनोहर मेहेर प्रसिद्ध कवि, ज्योतिषी थे । बचपन में मेरे दादाजी से उनके बारे में बहुत कुछ जाना, वे असामान्य प्रतिभा के योग्य अधिकरी थे । उनके लिखित पुस्तकें आज भी जनमानस में प्रचलित हैं ।

बचपन में हम सिनापालि में रहते थे, जो कि हमारा गांव है । गांव की वो मधुर चित्र आज भी मेरे मन में दिखाई देती है । १९८७ की बात है, मेरी आयु ५ साल थी । हमारे घर में एक ब्लाकबोर्ड था, जहाँ दादाजी ने बहुत कुछ सिखाया था । अमरकोष भी पढ़ते थे । ज्योतिष का ज्ञान भी मिला, हालाकि अभी सब भुल चुका हुँ । उनकी कविताओं को लिखना, उनके साथ पुजा करना, और न जाने अनगिनत पौराणिक कथाएँ सुनना – ऐसी अनेक अभुले स्मृती हैं जो हमेशा मनके किसी कोने से मुझे अध्यात्म में जाने के लिये प्रेरित करते हैं । मुझे आभास है, दादाजी और परदादाजी सुक्ष्म रूप से मुझे मार्गदर्शन दे रहे हैं ।

जीवन के ९-१० साल के अनमोल समय जो दादाजी के साथ रहा, वो सबसे बड़ी उपलब्धी है । मेरे जैसे अन्य बच्चे खेलते, कुदते, शैतानी करते, पढ़ते, लेकिन हमारे परिवार में इसके साथ सात्विक वाताबरण का प्रभाव बड़ा गहरा असर किया है, जो उनके कारण था । जीवन के रस्ते पर संयोग से मुझे बहुत तीर्थों, महात्माओं का दर्शना हुआ है । पूज्य गुरुजी निखिलेश्वरानन्द जी से दीक्षा लेने के बाद जीवन ने नया मोड़ लिया । उनके प्रेरणा से गुरुजी गोर्धनलाल जानी जी से मुझे अध्यात्म और ज्ञान से विज्ञान के क्षेत्र में जाने का पथ खुलगया, जो अभी मैं चलरहा हुँ ।

बोलतें हैं ना – भगवान के घर में देर है, अन्धेर नहीं । अगर कोई सच्चे दिल से कुछ भी करने का अथक, निरन्तर प्रयास करे तो अवश्य उसे प्राप्त होगा । दुनिया में बहुत सारे रहस्य हैं, जो की अच्छे जिज्ञासु को जानना चाहिये । सबसे बड़ा है आत्मज्ञान । इसे प्राप्त करने के लिये नचिकेता का उदाहरण सबसे श्रेष्ठ है । हमारे सनातन वैदिक धर्म, शास्त्र में इसे इतनी गुढ़ता से बताया गया है की इसको सही में जानने के लिये कठिन से कठिन प्रयास करनी पड़ेगी । सभी ने गुप्त जरीये से प्रकट किया है । जैसे -

कवीर की वाणी में –
समुद्र में बुन्द समाहि, यह जानत सब कोय ।
बुन्द में समुद्र समाहि, विरला जाने कोय ॥

गोस्वामी तुलसी दास लिखते हैं –
सीयाराम मय सब जग जानि
करऊं प्रणाम जोड़ी युग पाणी ।


अब इस अनुभूती को प्राप्त करने की प्रयास चालु है मुझ में । सन्सार रहस्यमय और विज्ञानमय है । इस विज्ञान को समझ ने के लिये अन्दर की वैज्ञानिक शक्ति को जगानी है । 

                                         क्रमशः

Sunday, September 13, 2015

ये मोतिआँ और न गिरने दो

न कुछ चाहा, न कुछ सोचा
बस उसके लिये खुदको सौँप दी !
ये प्रेम, कोमलता ही सदियों से
आपको लूटती, तड़पाती आ रही है ।

हे नारी !
और कितना साहस है दिलमें
पता है,
ये भन्डारा कभी खाली न होगा ।
ममता, प्रेम के सुमन कभी मुर्झाते नहीं
फिर ये अनमोल मोतिआँ क्युँ गिरजाते
इनको समेटे रखो, खुदके लिये ।

फरेब की ज़िन्दगी, निष्ठुर समाज में
क्या मिला, कुछ हासिल हुआ ?
सब तो खोया है, लुटाया है ।
ये सन्सार कभी सुधरेगा नहीं
सदियों से उसकी अहं के लिये
आपको बलि चढ़ाता आया है

खुदके लिये कभी समझो
ये ईश्वर कोई और है
अब अमृत की धारा को रोको
ये मोतिआँ और न गिरने दो ।

(सभी नारिओँ को समर्पित) 
             सर्वेश्वर मेहेर - १३-०९-२०१५

Sunday, January 25, 2015

Love

Confidence debile; Unstable I, recurrent
For love, I merely repent.
Rather than love, it is business
Flashed in mind many a times, I guess.
Didn't have the passion to go through
When failed to veil pain, showed it though.
Of separation, the pain
After arrival of the bygone, still remain.
How the person has deserted so!
Its presence leaves and stays though.
Of union and separation, the strange game,
Love is; Makes me happy and cry, as a name.
Let be a fence, between us, there
Even though, I crossed it mere.
The dejected, I, cries on its future fatal
And nurtures your fortune vital
In the mention of lover, co-incidence
I still succumb and smile in sense.


[Original : Urdu Shayari by Gaurav Sood
English Transation : Sarbeswar Meher\

Monday, January 12, 2015

श्मशान

श्मशान से पबित्र
हो नहीं सकता
ना कोई स्थल
ना कोई स्थान ।
न मालुम इस भूमि में
प्रज्वलित अग्नि
सदियों से
कितने जीवों के
प्राणरहित देहों की
आहुति लेती आ रही है
और लेती रहेगी ।

कितने योद्धा, राजा, साधु, नेता
भस्म हुए,
प्रज्वलित अग्नि के रुप में
महाकाल की जिव्हा में ।
घमण्ड, प्रेम, द्वेश, लाज भी
बलि चढ़े यहाँ ।
सभी को राख में ही मिलना है
सिखाती यह ज्ञा
शुन्यता की
शरीर से मुक्ति की, चेतना की ।

पुण्याश्रय है श्मशान
है स्वच्छ, निर्मल
न कोई भेदभाव है उसमें
उससे डरकर भाग नहीं सकते ।
ना पृथ्वी, आकाश, पाताल में,
कहीं भी कोई स्थान नहीं
जहाँ छिपकर तुम बच सकते ।

पहली मुलाकात

बातें तो किये कितने
और चाटिन्ग भी कभी थमी नहीं
बिना मुलाकात ये सिलसिला
कभी रुका नहीं, कभी थका नहीं ।

शायद है ये रिस्ता
बहुत पुराना और करीब
जोकि इस जनम में हुआ
पहला मिलना माँ के समीप ।

नसीब तो उसने ही बनाया
ह्म तो बस कठपुतलियां
कैसी उसकी अनोखी लीला
कैसी ये पहेलियां ..... ।

आयी जब मिलने तुम
हुई आषाढ़ी शाम सुहानी
देखते ही की कितनी बातें
जैसे ना थी तुम अनजानी |

महल, बाग़ान हुए खुश इस रानी को देख
और् वहीं दो पन्छि भी मिल रहे थे
क़ैद हुआ कुछ उनकी निशानियां
शायाद भूले नग़मे याद दिला रहे थे ।

नैन तो बहुत थे चन्चल
था तो पुरा बदन हलचल
मुस्कान से भरी होंठ लाल 
की जारही थी दिल को घायल ।

अभी भी याद हैं वोह पल
अब बारबार क्या पुछें तुम्हें
अग़र भूलें, तो याद दिलायेगी ये कविता
अब तुम गुनगुनाओ इन्हें । 

Thursday, December 18, 2014

Hidden Serpent

Let me be bitten with the poison of nectar
Let me be free from bondages since many lives
Passing through the paths of karma and luck
Lost my true nature, lost myself completely
O Hidden Serpent! Rise and Let me awaken.



Thursday, October 30, 2014

नहीं भूलेंगे – रात १

नहीं भूलेंगे
रात की चाँदनी और फैला कालिमा
सब नींद की चादर में ओढ़े हुए
ना तो कोई शोरगुल, ना कोई हलचल
हवा भी जैसे चुप्पी लेके बैठा
रात में बस तुम और हम ...

खुले आंसमान में पन्ख फैलाने
उड़ने के लिये आये छत पर
दो प्रेम-पन्छि साथसाथ
शायद इस सन्सार से कंही दुर जाने
एक दुसरे के भरोसे लिये ।

मनमें उमंग नया
आंखो में कुछ नये सपने
हाथों में हाथ लिये
लेकिन मिलन से बिछड़े हुए ।

चुपचाप सन्नाटे में
कुछ जान डालने आये जैसे
आंखो में मदहोशी भरी
एक दुजे में डुबने के लिये ।

नयन से नयन बातें किये
बाहों से बाहें मिले पुरे
भिगे नैन से अश्रु गिरे
यादगार लम्हें जैसे ठहरे ।

धीरे धीरे बढ़ी धड़कन
और हुआ होंठो का मिलन
कसके समेटे हुए दो तन
भुला सब, इसमें रमा मन ।

कभी केशों को मुक्त करके
सुगन्धि जैसे फैल रहा
और लबों का अनुभव
तन को महकाता रहा ।

विराम हुआ जब कुछ पलमें
सपनों में मिलना सच हुआ
आंखो में नशा तब भी था
धधकती प्यास भी कम हुआ ।

साक्षी तो था ही वो रात
सबेरा लाया नयी मुसकान
आंखो में भरी नयी कसक 
और दिल में भरे प्रेम-सुमन